सुख दुःख तो आते रहते हैं
पग में क्यों काँटे चुभते हैं
तुम कह दो तो मैं विष पी लूँ
अमृत का आचमन तुम्हे दूँ
पथ में तेरे फूल बिछा दूँ
काँटो को आँचल में ले लूँ
यदि मैं कोई गुफा देख लूँ
सखे सुघड़ तेरा जग तज दूँ
यह अस्तित्व शून्य में खो दूँ
रथ को बढ़कर वहीं रोक दूँ
महिमा के चरणों को छू लूँ
उस रंग में तन मन मैं रंग लूँ
यों तो सब लौट करते है
मैं भी रूप बदल कर लौटूँ
Sunday, 25 November 2007
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7 comments:
यह भावना सब में हो तो सब के लिये अमॄत होगा। हलाहल होगा ही नहीं। और अमृत पर्याप्त होगा!
तुम कह दो तो मैं विष पी लूँ
अमृत का आचमन तुम्हे दूँ
काश ! हम सब इसी भाव को अपना लें !
"यों तो सब लौटा करते है
मैं भी रूप बदल कर लौटूँ"
अच्छी कविता है. विश्वास और आशा की किरणे बिखेरती हुई.
बहुत अच्छी कविता है। इनको आवाज में भी टेप करना अगली बार और यहां डालना!
बहुत सुन्दर !
घुघूती बासूती
तुम कह दो तो मैं विष पी लूँ
अमृत का आचमन तुम्हे दूँ
"यों तो सब लौटा करते है
मैं भी रूप बदल कर लौटूँ"
मन को छूने वाली पंक्तियाँ।
Respected Vimala ji!
your poetry touches me. want to send U a personal mail. pl give ID as your profile is not giving the proper information.
thank you
with regards
kanchan
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