Saturday 22 December 2007

प्रभु तुम कब आँचल पकड़ोगे?

जिधर भी देखती हूँ प्रभु
तुम ही दिखाई देते हो
तुम्हारी दृष्टि मुझ पर पड़ती है
तुम तत्काल वरदान दे देते हो
दुर्भाग्य मेरे पीछे चल पड़ता है
कब वरदान की अवधि पूरी हो
दुर्भाग्य मेरा आँचल पकड़ ले

मैंने भी तो स्वभाव बना लिया
दोनों का साथ निभाने का
तुम्हारा सा सयानापन मुझे भी भा गया है

मैं किनारे खड़ी हूँ
दोनों बारी-बारी से मेरा आँचल पकड़ लेते हैं
मौसम की तरह मुझ पर से गुज़रते हैं

प्रभु तुम कब आँचल पकड़ोगे?

Wednesday 5 December 2007

बिखर गई है प्रीत

सब रंग उत्सुक
मूक खड़े हैं
नहीं आए मन मीत
सब रंग मिल के एक वरण भये
शब्द बने संगीत
कौन बुलाए किसको ढूँढू
बिखर गई है प्रीत

Saturday 1 December 2007

कैसे मैं आँगन में आऊँ

द्वारे पर है भीड़ तुम्हारे
कैसे मैं आँगन में आऊँ
माँ मेरा भी हृदय विकल है
कैसे तेरा दर्शन पाऊँ
हाथों में है क्षत्र नारियल
चक्षु बन गए विस्तृत आँगन
अंतर में है गुफा तुम्हारी
कैसे माँ मैं दीप जलाऊँ
कैसे मैं आँगन में आऊँ
एक शिखर से वहीं विसर्जित
चरणों में मैं शीश नवाऊँ
खोज रही पग कहाँ पखारूँ
किधर शिला है जहाँ बैठकर
कितने युग तक राह निहारूँ
मन को कैसे धीर बधाऊँ
कैसे मैं आँगन में आऊँ
ज्ञान बीज किस भूमि में बो दूँ
फूल खिलें मैं पथ में बिछाऊँ
पथ में अगणित दीप जलाऊँ
कितने युग तक राह निहारूँ
कैसे मैं आँगन में आऊँ

Thursday 29 November 2007

आज नहीं मैं कल आऊँगी


धन्यवाद कहने आऊँगी

आज नहीं मैं कल आऊँगी

धीरे-धीरे पथ पर चल कर

पग पग पर तेरा कर धर कर

रोम-रोम में तुझ को भर कर

कण-कण में तुझको ही लख कर

पूर्ण समर्पण भाव हृदय धर

तुमसे मैं मिलने आऊँगी

धन्यवाद कहने आऊँगी

तुमको याद किया है मैंने

क्षण-क्षण नमन किया है मैंने

घूम घूम परिक्रमा की है

रो-रो कर पात्र भरा है मैं ने

अर्घ्य दान करने आऊँगी

आज नहीं मैं कल आऊँगी

Sunday 25 November 2007

मैं भी रूप बदल कर लौटूँ

सुख दुःख तो आते रहते हैं
पग में क्यों काँटे चुभते हैं
तुम कह दो तो मैं विष पी लूँ
अमृत का आचमन तुम्हे दूँ

पथ में तेरे फूल बिछा दूँ
काँटो को आँचल में ले लूँ
यदि मैं कोई गुफा देख लूँ
सखे सुघड़ तेरा जग तज दूँ
यह अस्तित्व शून्य में खो दूँ
रथ को बढ़कर वहीं रोक दूँ
महिमा के चरणों को छू लूँ
उस रंग में तन मन मैं रंग लूँ
यों तो सब लौट करते है
मैं भी रूप बदल कर लौटूँ

Friday 23 November 2007

जो मिल नहीं पाया है

जो मिल नहीं पाया है,
वह मैंने भुलाया है।
जो लिपट गया मुझसे,
अधरों से लगाया है।
जो कहना कठिन है,
गा-गा के सुनाया है।
जो रुक नहीं पाया है,
आँसू में बहाया है।
जो दिख नहीं पाया है,
सपनो में बुलाया है।

Thursday 22 November 2007

किसका बढ़ कर स्वागत करती?

उतरूँ तो मैं तल में डूबूँ
ऊर्ध्व मुख हो शिखर चूम लूँ
क्षण क्षण मैं न्योछावर होती
पल पल अरि का तर्पण करती
प्रतिक्षण रूप बदलती रहती
बिना मंच के अभिनय करती
नव नूतन नर्तन नित करती
सूत्रधार तेरी गति भरती
सागर की अनगिन लहरों में
चरण चिह्न मैं ढूँढा करती
किस से बढ़ कर परिचय करती?
किसका बढ़ कर स्वागत करती?

Thursday 15 November 2007

कहीं दान दिया

कहीं दान दिया
प्रतिदान लिया
कहीं माँग लिया
कहीं छीन लिया
कहीं हाथ बढ़ा कर उठा लिया
कहीं श्रद्धा से स्वीकार किया
कहीं ठिठक गए
कहीं बहक गए
कभी प्यार विषवमन करता है
कभी घृणा अमिय बरसाती है

Monday 12 November 2007

पीड़ा तेरे रूप अनेक

कौन बताये क्या है भेद
पीड़ा तेरे रूप अनेक
पहले पता खोजती फिरती
फिर है मिलती निमित्त विशेष
हाथ पकड़ करती आलिंगन
बनती स्वयं का ही प्रतिवेष
पीड़ा तेरे रूप अनेक

पहले तो करती हो स्वागत
बढ़ कर फिर करती हो अभिषेक
पीड़ा तेरे रूप अनेक

पहली लगती हो रोमांचक
फिर हो जाती हो अभिप्रेत
पहले अनदेखी अनजानी
चहुँदिशि अब तुम ही सर्वेश
पीड़ा तेरे रूप अनेक

वाष्प मेघ जल, वाष्प मेघ जल
अद्भुत विश्व रचयिता एक
यह कैसा अनिकेत निकेतन
दृष्टि एक और दृश्य अनेक
पीड़ा तेरे रूप अनेक

सिन्धु सिमिट कर बिन्दु
पलक में सुन्दर है मुक्तेश
प्रति पद घात बिलखती फिरती
अब सुन्दर मूरत सुविशेष
जाग्रत स्वप्न देखती पलकें
परिचित परिचय में क्या भेद
पीड़ा तेरे रूप अनेक

-२१.१०.९७

Tuesday 6 November 2007

मधुर नाम है राम तुम्हारा

मधुर नाम है राम तुम्हारा।
परम मंत्र है नाम तुम्हारा॥

राम नाम है, राम राह है, राम लक्ष्य है, राम मंत्र है।
सुन्दर नाम है राम तुम्हारा, सुन्दरतम है रूप तुम्हारा।
मधुर नाम है राम तुम्हारा।

राम भाव है, राम स्तोत्र है, राम आदि है, राम अन्त है।
दिव्य नाम है राम तुम्हारा, दिव्य रूप है राम तुम्हारा।
मधुर नाम है राम तुम्हारा।

राम शक्ति है, राम विजय है, राम प्रेम है, राम इष्ट है।
शुभारम्भ है नाम तुम्हारा, इष्टमंत्र है राम तुम्हारा।
मधुर नाम है राम तुम्हारा।

दिव्य गान है नाम तुम्हारा, जन्म दिवस है नाम तुम्हारा।
आज धन्य लिख लिख नाम तुम्हारा।
आज मुग्ध लख रूप तुम्हारा।
मधुर नाम है राम तुम्हारा।
परम मंत्र है नाम तुम्हारा।।

Friday 2 November 2007

वाणी है संगीत

दर्शन के मंदिर का दीपक
सखी बना संगीत
पूजा की थाली का चंदन
सखी बना प्रतीक
सोया मन तो जाग उठा है
उड़ने से भयभीत
हर कण है गुम्फित आकर्षण
बाँट रहा नवनीत
रस रत्नाकर सखि अद्भुत है
क्रम से नाचे नौ तस्वीर
अपना कह कर है आमंत्रण
परसे, विसरे नीति
किसको दोष सखि अब दूँ मैं
सब की है एक ही लीक
रचना ही साकार ब्रह्म है
वाणी है संगीत

Tuesday 30 October 2007

मत सुन लेना क्या कहती हूँ

मत सुन लेना क्या कहती हूँ।
नीरव स्वर छल-छल बहती हूँ॥
विस्तृत है आकाश तुम्हारा।
बिन पंखों के ही उड़ती हूँ।।
अतल सिंधु सी गोद तुम्हारी।
बिन नौका के ही तिरती हूँ॥
मैं इच्छा साकार तुम्हारी।
बिन इच्छा के ही रहती हूँ।।
मन्दिर है बेजोड़ तुम्हारा।
क्षण-क्षण क्यों टूटा करती हूँ।।
कदम-कदम पर साथ तुम्हारा।
जाने क्यों ढूँढा करती हूँ॥
प्रवेश द्वार है कहाँ तुम्हारा।
मिलना है चलती रहती हूँ॥

-१९.१०.९१

Sunday 28 October 2007

जीवन मैंने देखा जैसा

जगत मंच पर उत्सव जैसा
भाव-सिंधु भव-सागर जैसा
जीवन मैंने देखा जैसा
प्रभु की दुर्लभ इच्छा जैसा
तीरथ की पगडण्डी जैसा
फेरे जैसे धरती जैसा
भगीरथ की गंगा जैसा
पूर्ण से पूर्ण निकलने जैसा
बंद मुट्ठी में सिकता जैसा
कुछ खोकर फिर पाने जैसा
एक अथक प्रतीक्षा जैसा
सात सुरों के सरगम जैसा
आरोहण-अवरोहण जैसा
पूजा और अर्चना जैसा
प्रभु मंदिर में दीपक जैसा
श्री गिरधर की गीता जैसा
जीवन एक साधना जैसा
जीवन मैंने देखा जैसा

-२६.१०.२००७

Friday 26 October 2007

यह कौन? यह कौन?

यह कौन? यह कौन?
साधना कर रहा बैठा?
रिद्धि-सिद्धि कर रही परिक्रमा
मुक्ति पड़ी चरणों में
यह कौन? यह कौन?

पवन डुलाता चँवर
सुमन ढलते हैं भू पर
धरा हो गई धन्य
दिग दिगन्त हैं मौन

विभोरता विहँस रही है
अनहद से भरपूर
यह कौन? यह कौन?

-२१ अक्तूबर २००७

Tuesday 23 October 2007

धूलि कण हूँ मैं यथावत


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

धूलि कण हूँ मैं यथावत
किन्तु तेरा अंश हूँ

मुग्ध मैं हूँ यथावत
किन्तु कितनी दूर हूँ

अभिभूत मैं हूँ अज्ञ बस
किन्तु मैं परिपूर्ण हूँ

तुम जहाँ पर हो खड़े
प्रभामण्डल चक्र में

बाँध दूँ किस छन्द में
गीत की किस पंक्ति में

-अक्तूबर ९, १९९३

Monday 22 October 2007

मैं धन्य हो गई

मेरी कविता से मेरा परिचय जान लिया,
मैंने बिन देखे ही स्वजनों को पहिचान लिया।
वास्तव में भाव और वाणी ही वास्तविक परिचय हैं जो हमें एक सूत्र में बाँधते हैं।

मैं धन्य हो गई जो कविता प्रिय लगी। मैं सबको आशीर्वाद, शुभकामनाओं के साथ धन्यवाद करती हूँ। वैसे इस उत्सव में मेरा प्रवेश कराने का सारा श्रेय मेरे बेटे अभय तिवारी को है। उसने जैसे प्रभु की पूजा की हो। मैं धन्य हो गई.. क्योंकि..

कैसे लिख जाती है कविता,
भाव कहाँ से आते हैं ?
हाथ ये कैसे लिख देते हैं,
शक्ति कहाँ से पाते हैं ?

Saturday 20 October 2007

कितने रूपों में आते हो

कितने रूपों में आते हो,
कब-कब मैं पहिचान सकी हूँ ?
कभी मन्द मुस्कान बने हो,
कभी अश्रु बन ढलक गए हो,
मदिर गन्ध बन छा जाते हो,
कब-कब तुम्हे निहार सकी हूँ ?

कब-कब मैं पहिचान सकी हूँ ?

-अक्तूबर ९३

जाऊँ जहाँ वही मिल जाये

जाऊँ जहाँ वही मिल जाये,
देखूँ जिधर वही दिख जाये,
जो कुछ सुनूँ नाम हो उसका।
कर स्पर्श करे बस उसका,
चहुँ दिशि से मुझ पर छा जाये।
खोज खोज कर हारी हूँ मैं,
मुझे खोजता वह मिल जाये।
चल दूँ तो हो नूतन सर्जन,
बैठूँ तो मंदिर बन जाये।
आशा डोर कभी ना टूटे,
शाश्वत सदा नित्य हो जाये।

-७ नवम्बर २००३

जब मै चाहूँ पंख पसारूँ

जब मै चाहूँ पंख पसारूँ
मुझको तुम उड़ने देना
वापस लौट सकूँ जब चाहूँ
द्वार खुला रहने देना
कैनवस खुला हो मन का
मुझे तूलिका तुम देना
कैसे रंग भरूँ उत्सव का
मुझे बताते तुम रहना
छू लेते हो छप जाती हूँ
क्या कहते हो सुन लेती हूँ

-9 अक्तूबर 2001