Thursday, 29 November, 2007

आज नहीं मैं कल आऊँगी


धन्यवाद कहने आऊँगी

आज नहीं मैं कल आऊँगी

धीरे-धीरे पथ पर चल कर

पग पग पर तेरा कर धर कर

रोम-रोम में तुझ को भर कर

कण-कण में तुझको ही लख कर

पूर्ण समर्पण भाव हृदय धर

तुमसे मैं मिलने आऊँगी

धन्यवाद कहने आऊँगी

तुमको याद किया है मैंने

क्षण-क्षण नमन किया है मैंने

घूम घूम परिक्रमा की है

रो-रो कर पात्र भरा है मैं ने

अर्घ्य दान करने आऊँगी

आज नहीं मैं कल आऊँगी

Sunday, 25 November, 2007

मैं भी रूप बदल कर लौटूँ

सुख दुःख तो आते रहते हैं
पग में क्यों काँटे चुभते हैं
तुम कह दो तो मैं विष पी लूँ
अमृत का आचमन तुम्हे दूँ

पथ में तेरे फूल बिछा दूँ
काँटो को आँचल में ले लूँ
यदि मैं कोई गुफा देख लूँ
सखे सुघड़ तेरा जग तज दूँ
यह अस्तित्व शून्य में खो दूँ
रथ को बढ़कर वहीं रोक दूँ
महिमा के चरणों को छू लूँ
उस रंग में तन मन मैं रंग लूँ
यों तो सब लौट करते है
मैं भी रूप बदल कर लौटूँ

Friday, 23 November, 2007

जो मिल नहीं पाया है

जो मिल नहीं पाया है,
वह मैंने भुलाया है।
जो लिपट गया मुझसे,
अधरों से लगाया है।
जो कहना कठिन है,
गा-गा के सुनाया है।
जो रुक नहीं पाया है,
आँसू में बहाया है।
जो दिख नहीं पाया है,
सपनो में बुलाया है।

Thursday, 22 November, 2007

किसका बढ़ कर स्वागत करती?

उतरूँ तो मैं तल में डूबूँ
ऊर्ध्व मुख हो शिखर चूम लूँ
क्षण क्षण मैं न्योछावर होती
पल पल अरि का तर्पण करती
प्रतिक्षण रूप बदलती रहती
बिना मंच के अभिनय करती
नव नूतन नर्तन नित करती
सूत्रधार तेरी गति भरती
सागर की अनगिन लहरों में
चरण चिह्न मैं ढूँढा करती
किस से बढ़ कर परिचय करती?
किसका बढ़ कर स्वागत करती?

Thursday, 15 November, 2007

कहीं दान दिया

कहीं दान दिया
प्रतिदान लिया
कहीं माँग लिया
कहीं छीन लिया
कहीं हाथ बढ़ा कर उठा लिया
कहीं श्रद्धा से स्वीकार किया
कहीं ठिठक गए
कहीं बहक गए
कभी प्यार विषवमन करता है
कभी घृणा अमिय बरसाती है

Monday, 12 November, 2007

पीड़ा तेरे रूप अनेक

कौन बताये क्या है भेद
पीड़ा तेरे रूप अनेक
पहले पता खोजती फिरती
फिर है मिलती निमित्त विशेष
हाथ पकड़ करती आलिंगन
बनती स्वयं का ही प्रतिवेष
पीड़ा तेरे रूप अनेक

पहले तो करती हो स्वागत
बढ़ कर फिर करती हो अभिषेक
पीड़ा तेरे रूप अनेक

पहली लगती हो रोमांचक
फिर हो जाती हो अभिप्रेत
पहले अनदेखी अनजानी
चहुँदिशि अब तुम ही सर्वेश
पीड़ा तेरे रूप अनेक

वाष्प मेघ जल, वाष्प मेघ जल
अद्भुत विश्व रचयिता एक
यह कैसा अनिकेत निकेतन
दृष्टि एक और दृश्य अनेक
पीड़ा तेरे रूप अनेक

सिन्धु सिमिट कर बिन्दु
पलक में सुन्दर है मुक्तेश
प्रति पद घात बिलखती फिरती
अब सुन्दर मूरत सुविशेष
जाग्रत स्वप्न देखती पलकें
परिचित परिचय में क्या भेद
पीड़ा तेरे रूप अनेक

-२१.१०.९७

Tuesday, 6 November, 2007

मधुर नाम है राम तुम्हारा

मधुर नाम है राम तुम्हारा।
परम मंत्र है नाम तुम्हारा॥

राम नाम है, राम राह है, राम लक्ष्य है, राम मंत्र है।
सुन्दर नाम है राम तुम्हारा, सुन्दरतम है रूप तुम्हारा।
मधुर नाम है राम तुम्हारा।

राम भाव है, राम स्तोत्र है, राम आदि है, राम अन्त है।
दिव्य नाम है राम तुम्हारा, दिव्य रूप है राम तुम्हारा।
मधुर नाम है राम तुम्हारा।

राम शक्ति है, राम विजय है, राम प्रेम है, राम इष्ट है।
शुभारम्भ है नाम तुम्हारा, इष्टमंत्र है राम तुम्हारा।
मधुर नाम है राम तुम्हारा।

दिव्य गान है नाम तुम्हारा, जन्म दिवस है नाम तुम्हारा।
आज धन्य लिख लिख नाम तुम्हारा।
आज मुग्ध लख रूप तुम्हारा।
मधुर नाम है राम तुम्हारा।
परम मंत्र है नाम तुम्हारा।।

Friday, 2 November, 2007

वाणी है संगीत

दर्शन के मंदिर का दीपक
सखी बना संगीत
पूजा की थाली का चंदन
सखी बना प्रतीक
सोया मन तो जाग उठा है
उड़ने से भयभीत
हर कण है गुम्फित आकर्षण
बाँट रहा नवनीत
रस रत्नाकर सखि अद्भुत है
क्रम से नाचे नौ तस्वीर
अपना कह कर है आमंत्रण
परसे, विसरे नीति
किसको दोष सखि अब दूँ मैं
सब की है एक ही लीक
रचना ही साकार ब्रह्म है
वाणी है संगीत