Wednesday 5 December 2007

बिखर गई है प्रीत

सब रंग उत्सुक
मूक खड़े हैं
नहीं आए मन मीत
सब रंग मिल के एक वरण भये
शब्द बने संगीत
कौन बुलाए किसको ढूँढू
बिखर गई है प्रीत

2 comments:

Mired Mirage said...

आपकी कविताएँ पढ़ने पर हर बार कुछ नये भाव मिलते हैं और मिलती है खुशी ।
घुघूती बासूती

आभा said...

बारमबार बखान......