द्वारे पर है भीड़ तुम्हारे
कैसे मैं आँगन में आऊँ
माँ मेरा भी हृदय विकल है
कैसे तेरा दर्शन पाऊँ
हाथों में है क्षत्र नारियल
चक्षु बन गए विस्तृत आँगन
अंतर में है गुफा तुम्हारी
कैसे माँ मैं दीप जलाऊँ
कैसे मैं आँगन में आऊँ
एक शिखर से वहीं विसर्जित
चरणों में मैं शीश नवाऊँ
खोज रही पग कहाँ पखारूँ
किधर शिला है जहाँ बैठकर
कितने युग तक राह निहारूँ
मन को कैसे धीर बधाऊँ
कैसे मैं आँगन में आऊँ
ज्ञान बीज किस भूमि में बो दूँ
फूल खिलें मैं पथ में बिछाऊँ
पथ में अगणित दीप जलाऊँ
कितने युग तक राह निहारूँ
कैसे मैं आँगन में आऊँ
Saturday, 1 December 2007
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7 comments:
बहुत सुंदर, भाव भरी माँ की अर्चना॥और उस से भी अच्छी लगी ये पंक्तियां………सन्नाटा निरन्तर आकर्षित करता था पर वहाँ रहने की इच्छा न थी,
बहुत सुंदर. अंधेरे से उजाले तक की यात्रा को नमन.
बहुत सुंदर
बेहतरीन कविता…
पढ़ते हुए मन भाव-विभोर हो गया… कुछ चिंतन कुछ संदेश… बहुत वास्तविक…।
कविता आनंदित कर गई अम्मा..
अति सुंदर! मन भाव विभोर हो गया!
ati sundar
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