Saturday 20 October 2007

जब मै चाहूँ पंख पसारूँ

जब मै चाहूँ पंख पसारूँ
मुझको तुम उड़ने देना
वापस लौट सकूँ जब चाहूँ
द्वार खुला रहने देना
कैनवस खुला हो मन का
मुझे तूलिका तुम देना
कैसे रंग भरूँ उत्सव का
मुझे बताते तुम रहना
छू लेते हो छप जाती हूँ
क्या कहते हो सुन लेती हूँ

-9 अक्तूबर 2001

7 comments:

अनूप शुक्ल said...

यह वाली तो पहले भी पढ़ चुका हूं। फिर से पढ़ना अच्छा लगा!

ALOK PURANIK said...

बेहतरीन, एक नयी दुनिया की उड़ान।
माताजी को चरण स्पर्श इस अनुरोध के साथ
कि हम जैसे बालकों को भी आशीर्वाद दें कि कुछ ठीकठाक सा लिख लें।

मीनाक्षी said...

विभोर जी
""मेरी कविता ही मेरे मन के भेद खोलती है। मैं जो कहूँगी वह अभी की बात है, अगले क्षण मैं क्या सोचूँगी, मैं खुद नहीं जानती। "

आपका परिचय पढ़्कर हम भी भाव विभोर हो गए. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति.. शायद मेरे ही मन की बात आपने कह दी ..

Udan Tashtari said...

पूर्व में भी इसे पढ़ा था. यह एक अद्भुत रचना है जो मुझे अति प्रिय है और आपके आशीर्वाद के तौर पर मैने इसे अपने कम्प्यूटर में काफी समय से सहेज रखा है.

राजीव said...

सुन्दर अभिव्यक्ति है।

अभय जी, इस चिट्ठे को बनाकर आपने जो माता जी की कविताएं प्रकाशित करने का कार्य किया है, वह सराहनीय है और यह पाठकों को भी भाव-विभोर करेंगी ऐसी आशा है।

mehek said...

heart touching

Siya said...

namaste dadi, maine apki sari kavitayein padhi aj..
bahut acha anubhaw hua .
aur bahut prerna bhi mili, jivan ko ujjwal roop mein dekhne ki...