Friday, 1 February, 2008

पद चिह्नों पर नहीं चलूँगी

पद-चिह्नों पर नहीं चलूँगी
यह आदेश नहीं मानूँगी
चरण-चिह्न हो अलग हमारे
इतना ही अनुरोध करूँगी

पद-चिह्न के साथ चलूँगी
उनके चारों ओर चलूँगी
पूजा भी उनकी कर दूँगी
आदर-मान सदा मैं दूँगी
पर इन पर मैं चलूँ प्रिये
इतना तो कर नहीं सकूँगी

तुम भी इसी जगत के वासी
मेरा भी अस्तित्व अलग है
अपने-अपने चिह्न के संग
हम दोनों एक साथ चलेंगे
तुम अपनी पहचान बनाओ
मैं अपनी धुन में रम लूँगी

पूज्य चरण पर चरण टिका कर
क्यों अपमान करूँ मैं उनका
मैं इनका अनुगमन करूँगी
उनसे कुछ शिक्षा भी लूँगी

पद-चिह्नो पर चलकर तुम भी
कोई राह नहीं पाओगे
चिह्न बनाकर आगे बढ़ते
कोई राह ढूँढ पाओगे

राह हमारी एक रहेगी
लक्ष्य हमारा एक रहेगा
चिह्न बनाते आगे बढ़ते
हम दोनों एक साथ चलेंगे

क्षितिज पार एक साथ करेंगे
चरण-चिह्न पर अलग रहेंगे

43 comments:

Anonymous said...

बेहद बेहद प्रभावशाली!

पारुल "पुखराज" said...

anmol bhaav...

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

प्रणाम ..कितनी सरलता से कविता में आपने अपनी बात कही है -- आपका लिखा बहुत सुन्दर होता है

Anonymous said...

प्रणाम
aap nae jo kehaa aur jis sandarbh mae kehaa petaa nahin kitano nae samjha
per aap kee is rachna ko mae apne blog per bina aap kii agyaa kae prassarit kar rahee hun kyokii maa ki har cheez per beti kaa adhikar sabse pehla hota hae

Anonymous said...

हम तो आपके इस ब्लाग को देखकर बड़े प्रसन्न हो गये. प्रणाम करते हैं माई आपके इस उत्साह को.

Anonymous said...

pahali baar dekha hai aap ka blog. bahut achchha laga. prabhavit kiya aap ki sakriyata va vishesh roop se svatantra chetna ne.



http://kvachaknavee.spaces.live.com/

http://360.yahoo.com/kvachaknavee

Sanjeet Tripathi said...

प्रणाम!!
बहुत दिनों बाद आया यहां और अब पढ़ने के बाद गुनता हुआ लौट रहा हूं।

mamta said...

बहुत-बहुत सुन्दर।
हमें तो तारीफ के लिए शब्द नही मिल रहे है।

रंजना said...

bahut hi sundar...anukarniya..

azdak said...

सुंदर..

राज भाटिय़ा said...

पद-चिह्नो पर चलकर तुम भी
कोई राह नहीं पाओगे
चिह्न बनाकर आगे बढ़ते
कोई राह ढूँढ पाओगे
सच मे पद-चिह्नो पर चलने वाले बहुत हे,लेकिन अपने पद-चिह्न बना कर जो चलते हे वोही राह भी पाते हे, धन्यवाद इतनी सुन्दर कविता के लिये.

Anonymous said...

aapka blog dekh kar bahut hi achha laga, aur aapne bahut hi achha likha hai.
shukriya. aabhar.

durga

Pratyaksha said...

सही सही !

कंचन सिंह चौहान said...

ओहहहह कितनी सुंदर रचना..! कितने सारे भाव...! समझो तो बहुत कुछ समझाने चलो तो शब्द नही...बहुत ही सुंदर..!

anuradha srivastav said...

प्रेरणास्पद..........

अफ़लातून said...

प्रणाम ।

Shastri JC Philip said...

मन को छू गया !! कुछ पंक्तियों ने तो सोचने को मजबूर कर दिया !!

बोधिसत्व said...

पद-चिह्नों पर नहीं चलूँगी
यह आदेश नहीं मानूँगी
चरण-चिह्न हो अलग हमारे
इतना ही अनुरोध करूँगी

माते कहने की यब सादगी काश हिंदी के कवियों को भी आशीष में दे देतीं आप....
आप को लगातार पढ़ रहा हूँ...पर टिप्पणी नहीं कर रहा हूँ...
क्षमा करें...आशीष दें...

मीनाक्षी said...

प्रणाम ! कविता में छिपे भाव को अगर हम सब समझ जाएँ तो क्या कहना.. ! राह दिखाती प्रभावशाली रचना !

डॉ .अनुराग said...

pranam
aap vakaai adhbhut hai aor khari bhi.

Dr. Chandra Kumar Jain said...

KITNA SUNDAR,KITNA ANUPAM
BHAV-JAGAT KA YAH GAHNA HAI
JO BHI PADH LE,JO BHI GUN LE
YAHI KAHEGA...KYA KAHNA HAI !
TUM SACHMUCH AVNEE HO MAATE !
JEEVAN KA RAS BAANT RAHI HO
BAS ITNA AASHISH HAMEN DO
JEENA TO YUN HI JEENA HAI...!

NAMAN...

Dr. Ravindra S. Mann said...

fantastic!!

Reetesh Gupta said...

पद-चिह्नो पर चलकर तुम भी
कोई राह नहीं पाओगे
चिह्न बनाकर आगे बढ़ते
कोई राह ढूँढ पाओगे

सचमुच अदभुत लगी कविता .प्रणाम..

Unknown said...

जब साथ साथ चलेंगे,
तब एक दूसरे के पद चिन्हों पर नहीं,
एक जैसे पद चिन्हों पर चलेंगे.

गरिमा said...

बहूत सुन्दर कहा,

बहूत कुछ कहती आपकी कविता, और जैसे आज के वक्त की माँग है यह कविता। simply great :)

abhivyakti said...

aaj net par achanak apka blog dekha .apki kavitaon ne mantramugdh kar diya.man ko chua hai apki kavita ne.
dr.jaya anand

'' अन्योनास्ति " { ANYONAASTI } / :: कबीरा :: said...

हमारे पास के शब्द तो आप के शब्दों की अनुगूंज में खो गये , aतः कोई टिप्पणी कर पाने में सक्षम नही रह गाया | Kavita Vachaknavee
जी का आभारी हूँ की यहाँ तक की राह बताई ||

Smart Indian said...

बहुत सुन्दर और प्रेरणादायक! यहाँ बांटने का आभार!

Deepshikha Verma said...

पूज्य चरण पर चरण टिका कर
क्यों अपमान करूँ मैं उनका
मैं इनका अनुगमन करूँगी
उनसे कुछ शिक्षा भी लूँगी

waah , bahut gehri rachna !

रंजना said...

ओह...क्या बात है....

मन मोह लिया इस अद्वितीय रचना के भाव और कला पक्ष ने...

इस सुन्दर कलम को नमन !!!

जितेन्द्र ‘जौहर’ Jitendra Jauhar said...

एक भावप्रवण और चिंतनप्रधान रचना है यह...आपको बधाई!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

मन को छू गयी रचना .... बहुत सुंदर प्रस्तुतीकरण

यशवन्त माथुर (Yashwant R.B. Mathur) said...

कल 22/03/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल (संगीता स्वरूप जी की प्रस्तुति में) पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

दीपिका रानी said...

नई पुरानी हलचल से यहां आना हुआ। मन विभोर हो गया आपकी इस कविता से।

mridula pradhan said...

bahut hi sunder ,dridh aur shaktishali kavita likhi hai aapne.....bahot pasand aayee.

Saras said...

क्षितिज पार एक साथ करेंगे
चरण-चिह्न पर अलग रहेंगे

आत्मसात करने वाले भाव...
आपके ब्लॉग पर पहली बार आना हुआ ....सुखद अनुभव रहा !

vandan gupta said...

दूसरों की बजाय अपने पदचिन्ह बनाना………वाह सुन्दर व सार्थक रचना।

Pallavi saxena said...

बहुत मनभावन भवाव्यक्ति उत्कृष्ट लेखन...

सदा said...

अनुपम भाव संयोजन लिए उत्‍कृष्‍ट अभिव्‍यक्ति ।

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

उत्तम रचना...
सादर.

Unknown said...

अच्छा लिखा है,आपने.जो भाव हैं,कविता में...वो सुन्दर हैं.

Kailash Sharma said...

क्षितिज पार एक साथ करेंगे
चरण-चिह्न पर अलग रहेंगे

...बहुत उत्कृष्ट प्रस्तुति...भावों और शब्दों का अद्भुत संयोजन...आभार

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) said...

पूज्य चरण पर चरण टिका कर
क्यों अपमान करूँ मैं उनका
मैं इनका अनुगमन करूँगी
उनसे कुछ शिक्षा भी लूँगी

बहुत श्रेष्ठ भाव , वाह !!!!!!!!!!!