पद-चिह्नों पर नहीं चलूँगी
यह आदेश नहीं मानूँगी
चरण-चिह्न हो अलग हमारे
इतना ही अनुरोध करूँगी
पद-चिह्न के साथ चलूँगी
उनके चारों ओर चलूँगी
पूजा भी उनकी कर दूँगी
आदर-मान सदा मैं दूँगी
पर इन पर मैं चलूँ प्रिये
इतना तो कर नहीं सकूँगी
तुम भी इसी जगत के वासी
मेरा भी अस्तित्व अलग है
अपने-अपने चिह्न के संग
हम दोनों एक साथ चलेंगे
तुम अपनी पहचान बनाओ
मैं अपनी धुन में रम लूँगी
पूज्य चरण पर चरण टिका कर
क्यों अपमान करूँ मैं उनका
मैं इनका अनुगमन करूँगी
उनसे कुछ शिक्षा भी लूँगी
पद-चिह्नो पर चलकर तुम भी
कोई राह नहीं पाओगे
चिह्न बनाकर आगे बढ़ते
कोई राह ढूँढ पाओगे
राह हमारी एक रहेगी
लक्ष्य हमारा एक रहेगा
चिह्न बनाते आगे बढ़ते
हम दोनों एक साथ चलेंगे
क्षितिज पार एक साथ करेंगे
चरण-चिह्न पर अलग रहेंगे
Friday, 1 February 2008
Saturday, 12 January 2008
मैंने सपना देखा!
तुम आये सपने में मेरे
सुर-सरिता दिखलाते मुझको
दो फाक किवाड़े के
सुत गोद लिये
ठहरे पल भर फिर लुप्त हुए
मैं चकित खड़ी की खड़ी रही
क्या कहते हो बस सोच रही
एक मोड़ मिला
पीताम्बर धारे बैठे हो
प्रिय अभय इसे कल लाया था
मुसकाते कुछ कहते हो
ये मुग्ध भाव लख प्रभु तेरा
मै हरी-भरी हो जाती हूँ
सुर-सरिता अंतर में मेरे
अवगहन वहीं मैं करती हूँ
देखो कब फिर मिलती हूँ
सुर-सरिता दिखलाते मुझको
दो फाक किवाड़े के
सुत गोद लिये
ठहरे पल भर फिर लुप्त हुए
मैं चकित खड़ी की खड़ी रही
क्या कहते हो बस सोच रही
एक मोड़ मिला
पीताम्बर धारे बैठे हो
प्रिय अभय इसे कल लाया था
मुसकाते कुछ कहते हो
ये मुग्ध भाव लख प्रभु तेरा
मै हरी-भरी हो जाती हूँ
सुर-सरिता अंतर में मेरे
अवगहन वहीं मैं करती हूँ
देखो कब फिर मिलती हूँ
Tuesday, 8 January 2008
नौका
इस तट पर क्यों नौका बाँधी
कब तक यहाँ ठहरना बाकी
नाम पता कोई यदि पूछे
परिचय अपना क्या दूँ साथी
मुझे बता दो आज सखे तुम
किस की नौका , कौन है साथी
कब तक यहाँ ठहरना बाकी
नाम पता कोई यदि पूछे
परिचय अपना क्या दूँ साथी
मुझे बता दो आज सखे तुम
किस की नौका , कौन है साथी
Sunday, 6 January 2008
कौन देश से आए पथिक तुम
कानपुर के मेरे घर मे इन्टरनेट लग गया है और यह पहली कविता है जो मेरे घर से छापी जा रही है। ये काम भी मेरा बेटा अभय ही कर रहा है.. आप लोगों की प्रतिक्रियाएं भी मैं दूसरों के द्वारा सुनती हूँ। अपनी कमज़ोर होती आँखों के चलते नेट पर पढ़ना मेरे लिए आसान नहीं है। मीरा बाई की पंक्तियाँ मुझे याद आती हैं जो पहनावे सो ही पहनूँ जो देवे सो खाऊँ.. उसी मनोदशा में मैं हूँ।
मेरे पाठक ही मेरे आत्मीय हैं। बिन देखे ही जैसे मैं सबसे परिचित हूँ- किसी रूप और नाम की दरकार नहीं। जैसे एक ही भाव नदी में सब तैर रहे हैं अपनी-अपनी तरह से चेतना से प्रदीप्त प्रकाशमय और जागृत। मेरा उन सब को धन्यवाद, आशीर्वाद और स्नेह!
एक पुरानी कविता यहाँ प्रस्तुत है..
कौन देश से आए पथिक तुम
क्या है नाम तुम्हारा
किसकी तुम अद्भुत आशा हो
क्या है लक्ष्य तुम्हारा
मिलने का उद्देश्य तुम्हारा
मैंने जान न पाया
क्या है नाम तुम्हारा
युग युग की लालसा नयन में
वाणी में है याचना
चलते हो डगमग कदमों से
भूल गए हो रास्ता
जिसे ढूँढते मन में छिपा है
दीपक क्यों नहीं बारता
जहाँ खड़े हो लक्ष्य वही है
दृष्टि क्यों नहीं खोलता
क्या है नाम तुम्हारा
-३०-४-९३
मेरे पाठक ही मेरे आत्मीय हैं। बिन देखे ही जैसे मैं सबसे परिचित हूँ- किसी रूप और नाम की दरकार नहीं। जैसे एक ही भाव नदी में सब तैर रहे हैं अपनी-अपनी तरह से चेतना से प्रदीप्त प्रकाशमय और जागृत। मेरा उन सब को धन्यवाद, आशीर्वाद और स्नेह!
एक पुरानी कविता यहाँ प्रस्तुत है..
कौन देश से आए पथिक तुम
क्या है नाम तुम्हारा
किसकी तुम अद्भुत आशा हो
क्या है लक्ष्य तुम्हारा
मिलने का उद्देश्य तुम्हारा
मैंने जान न पाया
क्या है नाम तुम्हारा
युग युग की लालसा नयन में
वाणी में है याचना
चलते हो डगमग कदमों से
भूल गए हो रास्ता
जिसे ढूँढते मन में छिपा है
दीपक क्यों नहीं बारता
जहाँ खड़े हो लक्ष्य वही है
दृष्टि क्यों नहीं खोलता
क्या है नाम तुम्हारा
-३०-४-९३
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