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Monday, 22 October 2007

मैं धन्य हो गई

मेरी कविता से मेरा परिचय जान लिया,
मैंने बिन देखे ही स्वजनों को पहिचान लिया।
वास्तव में भाव और वाणी ही वास्तविक परिचय हैं जो हमें एक सूत्र में बाँधते हैं।

मैं धन्य हो गई जो कविता प्रिय लगी। मैं सबको आशीर्वाद, शुभकामनाओं के साथ धन्यवाद करती हूँ। वैसे इस उत्सव में मेरा प्रवेश कराने का सारा श्रेय मेरे बेटे अभय तिवारी को है। उसने जैसे प्रभु की पूजा की हो। मैं धन्य हो गई.. क्योंकि..

कैसे लिख जाती है कविता,
भाव कहाँ से आते हैं ?
हाथ ये कैसे लिख देते हैं,
शक्ति कहाँ से पाते हैं ?